किसान का बेटा बना 8 लाख करोड़ की कंपनी का हेड, जानिए कैसे पाया सक्सेस

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टाटा संस के नए चेयरमैन नटराजन चंद्रशेखरन बन गए हैं। इससे पहले वे टीसीएस (टाटा कन्सलटेंसी सर्विसेज) के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर थे। टाटा संस के नए चेयरमैन बनने के साथ ही वो टाटा समूह के सबसे युवा चेयरमैन में से एक बन गए हैं। किसान परिवार में जन्मे नटराजन की लाइफ काफी सिम्पल रही है। शुरुआती दौर में खेतों में काम करने वाले नटराजन को समझ में आ गया था कि आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई बहुत जरूरी है। बस फिर क्या था उन्होंने पढ़ाई में मन लगाना शुरू कर दिया। वे 8 लाख करोड़ की कंपनी के हेड है।

नटराजन चंद्रशेखरन का जन्म तमिलनाडु के एक रूढ़ीवादी परिवार में हुआ। इनके पिता किसान थे और कुछ समय के लिए चंद्रन (जैसा उन्हें सहयोगी बुलाते हैं) ने भी खेती-बाड़ी में हाथ आजमाया। कुछ महीने खेती करने के बाद वे समझ गए थे कि वे खेती करने के लिए नहीं बने हैं। वे जान चुके थे कि जीवन में कुछ करने के लिए पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी है। इसीलिए उन्हें किताबों में मन लगाना शुरू कर दिया। जिस वक्त देश में कम्प्यूटर को लेकर ज्यादा जागरुकता नहीं थी, चंद्रशेखरन ने कम्प्यूटर एप्लिकेशन में मास्टर्स डिग्री प्राप्त की।

कहा जाता है कि चंद्रन को कंपनी में उनके ससुर एस रामादोराई ने प्रमोट किया था, लेकिन चंद्रशेखरन ने अपनी काबिलियत के बलबूते पर सभी का मुंह बंद कर दिया।

बात 1986 की है, उस वक्त नटराजन कम्प्यूटर एप्लीकेशन्स में मास्टर्स डिग्री कर रहे थे। वे एक कॉलेज प्रोजेक्ट के सिलसिले में दो महीने के लिए टीसीएस आए थे। कंपनी के लोग इनके काम से इतना प्रभावित हुए कि जॉब ऑफर कर दिया। वे पहले ही दिन से अपने काम की बदौलत पहचान बनाते चले गए। टीसीएस में वाइस-चेयरमैन रह चुके एस रामदोराई ने 1993 में नटराजन को ब्राइट यंग टैलेंट कहकर बुलाया था। उन्होंने यह भी कहा था कि नटराजन में वर्ल्ड क्लास टीम बनाने की काबिलियत है। यही उनकी ताकत भी है। उन्होंने पारंपरिक तौर-तरीकों से हटकर नए प्रयोग किए, जो काफी सफल रहे। उनकी कार्यशाली इतनी पसंद की गई कि लोग कभी-कभी मजाक में कहते कि टीसीएस का मतलब है- टेक चंद्रा सीरियसली।

नटराजन चंद्रशेखरन ने 1987 में टीसीएस ज्वाइन किया था। अलग-अलग पदों पर अपने काम का शानदार प्रदर्शन दिखाने के बाद अक्टूबर, 2009 को उसी कंपनी के सीईओ बने। वे टीसीएस में सीओओ और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर का पद भी संभाल चुके हैं।

नटराजन को जितना लगाव अपने काम से है, उतना ही ध्यान वे फिटनेस की ओर भी देते हैं। वे बेहतरीन रनर हैं और एमस्टरडैम, बॉस्टन, शिकागो, बर्लिन, मुंबई, न्यूयॉर्क और टोक्यो में मैराथन रेस पूरी कर चुके हैं। उन्हें पैशनेट लॉन्ग-डिस्टेंस रनर कहना गलत नहीं होगा। उन्हें फोटोग्राफी पसंद है। जहां जाते हैं वहां की खूबसूरती को कैमरे में कैद कर लेते हैं। संगीत सुनकर खुद को रिलैक्स करते हैं।

चंद्रन के साथ काम कर चुके उनके साथियों का कहना है कि वे जमीन से जुड़े हुए हैं। वे कभी किसी को जरूरत से ज्यादा डांटते-फटकारते नहीं हैं। उनकी एक बात जो सबसे अच्छी है वह ये कि वे सबसे आगे रहकर टीम को लीड करते हैं। पीछे बैठकर केवल ऑर्डर नहीं देते हैं। वे साथ करने वाले सहयोगियों पर विश्वास करते हैं। उन्हें काम करने की आजादी देते हैं और टीम स्पिरिट बिल्ड करते हैं। उनके एक साथी का कहना है कि जब 2009 में चंद्रन टीसीओ के सीईओ घोषित किए गए तो उन्होंने 30 डायरेक्टर के लिए बूट कैंप आयोजित किया, जिसमें उन सभी को मैराथन के लिए तैयार किया गया। बूट कैंप से लौटने के बाद उन सभी का कहना था कि परफेक्ट शेप में आने से ज्यादा कैंप में साथ रहने के कारण सभी लोगों में मजबूत बॉन्डिंग डेवलप हुई है।

इन्फोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति, चंद्रन के बारे में अच्छे विचार रखते हैं। उनका कहना है कि चेयरमैन पद के लिए चंद्ररशेखरन ग्रेट च्वाइस हैं। वे हर वक्त टीम के साथ मिलकर सीखते रहते हैं। वे हर वक्त लोगों के साथ नई-नई चीजें बांटते हैं। यही एक सफल लीडर की पहचान है।

चंद्रन कभी किसी चीज के लिए हार नहीं मानते और चुनौतियों का पूरे जोश के साथ सामना करते हैं। जब वे 43 साल के थे तो फिटनेस को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर ने रोज 15 हजार कदम चलने को कहा था। अगले ही दिन वे वर्ली में अपने घर से सुबह-सुबह जॉगिंग के लिए चल पड़े। चूंकि वे स्पोर्ट्स से ज्यादा जुड़े नहीं थे, इसलिए पहले दिन केवल 100 मीटर दौड़ पाए। उन्होंने हार नहीं मानी और पूरे लगन के साथ दौड़ते रहे। मेहनत और दृढ़ निश्चय के कारण मात्र नौ महीने में वे 42 किमी मैराथन पूरी करने में सफल हुए और दुनिया में जहां मैराथन होती, वहीं पहुंच जाते।

चंद्रन किसी भी बात को कैजुअली नहीं लेते हैं। खास करके जब कुछ ऑफिस के काम से जुड़ा हो। वे हर कागज को पूरी गंभीरता के साथ पढ़ते हैं। चाहे काम आईटी से जुड़ा हो या एचआर से। बता दें कि चंद्रशेखरन के भाई एन श्रीनिवासन चेन्नई-बेस्ड मुरुगप्पा ग्रुप के फायनेंस डायरेक्टर हैं। श्रीनिवासन का कहना है कि चंद्रन बचपन से ही मेहनती और प्रतिबद्ध है। यह उसकी मेहनत का ही नतीजा है कि वे देश की सबसे बड़ी कंपनी में चेयरमैन के पद पर है। वे न कभी थकते है और न ही हार मानते है। उन्होंने यह भी कहा कि चंद्रशेखरन के लिए इतनी बड़ी जिममेदारी संभालना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन समय के साथ वे टाटा ग्रुप को पूरी तरह से समझ जाएंगे। जब तक इन्फोसिस ने विशाल सिक्का को सीईओ नहीं घोषित किया था, उस वक्त तक चंद्रशेखरन देश के सबसे अधिक सैलरी पाने वाले सीईओ थे। फायनेंशियल ईयर- 2016 में उनके पैकेज में 20 फीसदी बढ़ौतरी दर्ज की गई थी।